सोहर की परंपरा को वैश्विक पहचान दिलाएगी ‘पहल’ संस्था
25 मई 2026 को बस्ती में 2100 महिलाएँ एक साथ ‘रामजी का सोहर’ गाकर गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने का प्रयास करेंगी. ‘पहल’ संस्था का यह आयोजन भारतीय लोकसंस्कृति और नारी शक्ति को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में एक खास पहल है.
भारत की सनातन परंपरा में जब भी घर-आंगन में कोई शुभ अवसर आता है, तो उसके साथ गीत-संगीत की मिठास भी जुड़ जाती है. ऐसा ही एक खास लोकगीत है “सोहर”, जिसे बच्चे के जन्म के समय महिलाएँ खुशी और आशीर्वाद के रूप में गाती हैं. यह सिर्फ गीत नहीं, बल्कि माँ की ममता, परिवार के स्नेह और भारतीय संस्कारों की पहचान है.
कब से हुई शुरुआत-
नए भारत के जन्म पर सोहर गायन के बारे में - मनीष मिश्रा (पहल संस्था के अध्यक्ष तथा समाजसेवी) का कहना है कि सोहर की शुरुआत का कोई लिखित इतिहास नहीं मिलता, क्योंकि यह परंपरा सदियों से लोगों के जीवन का हिस्सा रही है. माना जाता है कि “सोहर” शब्द संस्कृत के “शोभन” शब्द से बना है, जिसका अर्थ होता है मन को अच्छा लगने वाला. कुछ लोग इसे “शोकहर” से भी जोड़ते हैं, क्योंकि बच्चे का जन्म घर के दुख-दर्द को दूर कर देता है.

पहल’ संस्था का बड़ा अभियान-
आज भी गाँवों में यह परंपरा जीवित है, लेकिन आधुनिक जीवनशैली के कारण धीरे-धीरे कम होती जा रही है. इसी परंपरा को बचाने और दुनिया तक पहुँचाने के लिए ‘पहल’ संस्था ने एक बड़ा अभियान शुरू किया है. संस्था ने उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले की महिलाओं को आर्थिक सहायता देकर “राम जी का पेड़ा” और “राम जी का झोला” बनाने का काम शुरू कराया है. खास बात यह है कि महिलाएँ यह काम “रामजी का सोहर” गाते हुए करेंगी.
भव्य कार्यक्रम में आयोजित-
इसी कड़ी में 25 मई 2026 को बस्ती में एक भव्य कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा, जिसमें 2100 महिलाएँ एक साथ “रामजी का सोहर” गाएँगी. यह अपने आप में एक अनोखा रिकॉर्ड होगा, जिसे गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज कराने की तैयारी है.
देश में शांति और विकास के नए दौर की शुरुआत-
इस कार्यक्रम को नए भारत के उत्सव से भी जोड़ा गया है. नक्सलवाद से मुक्ति के बाद देश में शांति और विकास के नए दौर की शुरुआत को “नए भारत का जन्म” माना जा रहा है. उसी खुशी में महिलाएँ सोहर गाकर देश की उन्नति और खुशहाली की कामना करेंगी.
पारंपरिक बोलों के जरिए संदेश-
“जुग-जुग जिया सु ललनवा, भवनवा के भाग जागल हो” जैसे पारंपरिक बोलों के जरिए यह संदेश दिया जाएगा कि जैसे बच्चे के जन्म पर घर में खुशियाँ आती हैं, वैसे ही नए भारत के उज्ज्वल भविष्य का भी पूरे देश को मिलकर स्वागत करना चाहिए.

संस्कृति की अमूल्य धरोहर-
सोहर हमारी संस्कृति की अमूल्य धरोहर है. यह नारी-शक्ति, प्रेम, संस्कार और सामूहिक खुशी का प्रतीक है। जरूरत है कि हम सब मिलकर इस परंपरा को आगे बढ़ाएँ, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी अपनी मिट्टी और संस्कृति से जुड़ी रहें.