बहनों से मिली प्रेरणा, सोनी सब के ‘हुई गुम्म यादें’ में डॉ. देव बने इकबाल खान
इकबाल खान ने बताया कि सोनी सब के सीरियल ‘हुई गुम्म यादें: एक डॉक्टर, दो जिंदगी’ में सहानुभूतिपूर्ण डॉ. देव का किरदार निभाने के लिए उन्हें अपनी बहनों से गहरी प्रेरणा मिली, जिन्होंने उन्हें संवेदनशीलता और करुणा की सीख दी.
सोनी सब अपना आगामी शो, 'हुई गुम्म यादें: एक डॉक्टर, दो जिंदगियां' लॉन्च करने के लिए पूरी तरह तैयार है. यह शो एक ऐसे डॉक्टर की मार्मिक कहानी कहता है जिसका जीवन उसकी याददाश्त खोने के बाद बदल जाता है और इस प्रक्रिया में, वह अपने मरीजों को उनके चिकित्सीय इतिहास से परे, एक अधिक व्यक्तिगत स्तर पर देखने लगता है. डॉ. देव (इकबाल खान) न केवल अपने अतीत को पुनः प्राप्त करने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि वे धीरे-धीरे यह भी समझ रहे हैं कि एक डॉक्टर होने के लिए करुणा कितनी आवश्यक है.
बहनों से मिली प्रेरणा-
डॉ. देव की भूमिका निभाने वाले इकबाल खान के लिए यह सफर बेहद व्यक्तिगत रहा किरदार की तैयारी के दौरान, इकबाल को प्रेरणा के लिए अपने घर के आस-पास के लोगों की ओर रुख करना पड़ा उनकी दोनों बहनें डॉक्टर हैं, इसलिए उन्होंने बचपन से ही देखा है कि मरीजों की देखभाल का असली मतलब सिर्फ दवाइयों और रिपोर्टों तक सीमित न रहकर क्या होता है. लोगों की सबसे कमजोर स्थिति में उनकी देखभाल करते हुए उन्हें यह समझने में मदद मिली कि सहानुभूति अक्सर एक डॉक्टर का सबसे शक्तिशाली हथियार होता है.

एक अहम भावनात्मक सहारा-
इकबाल बताते हैं कि उनके मन में सबसे ज़्यादा बसी हुई बात उनकी बहनों की शांत करुणा थी, जिस तरह वे सुनती हैं, समझती हैं और अपने मरीज़ों के साथ पूरी तरह से मौजूद रहती हैं, खासकर उनकी कमज़ोरी के पलों में. सहानुभूति की यह गहरी भावना डॉ. देव का किरदार निभाते समय उनके लिए एक अहम भावनात्मक सहारा बन गई, खासकर ऐसी कहानी में जहाँ किरदार धीरे-धीरे खुद को और अपने आस-पास की दुनिया को फिर से खोज रहा है.
डॉक्टर होना केवल चिकित्सीय कौशल नहीं बल्कि सहानुभूति-
इस प्रभाव के बारे में बात करते हुए इकबाल खान कहते हैं, “मेरी दोनों बहनें डॉक्टर हैं और जो बात मुझे सबसे ज़्यादा प्रभावित करती है, वह है मरीजों के प्रति उनकी करुणा, जिस तरह वे धीमे होकर, ध्यान से सुनती हैं और तनावपूर्ण स्थितियों में भी मरीजों को यह एहसास दिलाती हैं कि उनकी बात सुनी जा रही है. मेरी बहन सबीना, जो ऑस्ट्रेलिया में प्रैक्टिस करती हैं, मरीज के पास आते ही लगभग एक सचेत अवस्था में आ जाती हैं, न केवल लक्षणों को बल्कि उनके पीछे की भावनाओं और व्यक्तिगत परिस्थितियों को भी समझती हैं. डॉ. देव के किरदार की तैयारी करते समय, मैंने जानबूझकर उस शांत, आश्वस्त करने वाली उपस्थिति को किरदार में उतारने पर काम किया, जिस तरह से वह बोलते हैं, जिस तरह से वह सुनते हैं और यहां तक कि जिस तरह से वह मौन में प्रतिक्रिया करते हैं. इसने मुझे याद दिलाया कि डॉक्टर होना केवल चिकित्सीय कौशल के बारे में नहीं है, यह सहानुभूति के बारे में है, और यही वह चीज है जिसे मैंने हर दृश्य में दर्शाने की कोशिश की है.”
आपको बता दे 'हुई गुम्म यादें - एक डॉक्टर, दो ज़िन्दगियां' जल्द ही सोनी सब पर आ रहा हैं.