बच्चों की खराब हड्डियों का मां की हड्डी से किया इलाज, आकाश हेल्थकेयर के डॉक्टरों की तकनीक ने पूरे किए 5 साल
दिल्ली के आकाश हेल्थकेयर के डॉक्टरों ने मां की हड्डी के ग्राफ्ट से बच्चों की खराब हड्डियों का पुनर्निर्माण किया। इस अनूठी तकनीक से इलाज कराने वाली पहली मरीज के पांच साल पूरे हो गए हैं और वह सामान्य जीवन जी रही है।
बच्चों की हड्डियों में कैंसर या गंभीर संक्रमण होने पर कई बार उनकी हड्डियों को दोबारा बनाना मुश्किल हो जाता है। ऐसे मामलों में कुछ बच्चों के सामने पैर काटने तक की नौबत आ जाती है। लेकिन दिल्ली के आकाश हेल्थकेयर सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने एक अनूठा तरीका अपनाकर बच्चों की हड्डियों का पुनर्निर्माण किया। इसमें बच्चों की मां की फिबुला यानी पैर की छोटी हड्डी के एक हिस्से का इस्तेमाल किया गया।
एक लड़की की सर्जरी के पांच साल पूरे-
इस तकनीक से 2021 में इलाज कराई गई एक लड़की की सर्जरी के पांच साल पूरे हो गए हैं। डॉक्टरों के मुताबिक, उसकी दोबारा बनाई गई हड्डी अच्छी तरह बढ़ रही है और वह सामान्य रूप से चल-फिर पा रही है।

मां की हड्डी से दोबारा बनाई बच्चों की हड्डी-
साल 2021 में 16 साल की एक लड़की की जांघ की हड्डी पुरानी बीमारी और संक्रमण के कारण खराब हो गई थी। डॉक्टरों ने उसकी मां की फिबुला हड्डी के ग्राफ्ट की मदद से जांघ की हड्डी को दोबारा बनाया। इसके बाद 2022 में 14 साल की एक दूसरी बच्ची का भी इसी तकनीक से इलाज किया गया। उसे भी जांघ की हड्डी में पुराना संक्रमण और फ्रैक्चर की समस्या थी। डॉक्टरों के मुताबिक, जब उन्होंने इस तरीके पर उपलब्ध मेडिकल जानकारी देखी, तो पाया कि मां की फिबुला हड्डी का इस्तेमाल बच्चों में पहले हाथ की हड्डी से जुड़ी समस्याओं के लिए किया गया था। इसके बाद टीम ने इस तकनीक को पैरों की हड्डियों के पुनर्निर्माण में भी इस्तेमाल करने का फैसला किया।

कैंसर से पीड़ित बच्चों का भी हुआ इलाज-
पांच साल का बच्चा-
इस तकनीक से उज्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान के चार अन्य बच्चों का भी इलाज किया गया। इनमें से तीन बच्चे कैंसर से पीड़ित थे। एक पांच साल के बच्चे की जांघ की हड्डी में कैंसर का ट्यूमर था। डॉक्टरों ने ट्यूमर निकालने के बाद उसकी मां की फिबुला हड्डी के हिस्से से हड्डी का पुनर्निर्माण किया।
11 साल का बच्चा-
इसी तरह, 11 साल के एक बच्चे की जांघ की हड्डी में कैंसर था। उसके इलाज में भी मां की हड्डी और विशेष रूप से तैयार की गई प्लेट का इस्तेमाल किया गया। दोनों बच्चों को उनके देश में पैर काटने की सलाह दी गई थी, जिसके बाद उनके परिवार इलाज के लिए दिल्ली आए।
तीन साल का बच्चा-
इसके अलावा, ताजिकिस्तान के तीन साल के एक बच्चे की बांह की हड्डी में ट्यूमर का इलाज किया गया। वहीं, उज्बेकिस्तान की करीब 11 साल की एक बच्ची की पैर की हड्डी से जुड़ी जन्मजात समस्या और संक्रमण का इलाज भी इसी तरह किया गया।
डॉक्टरों ने क्या कहा?
इस सर्जिकल टीम का नेतृत्व आकाश हेल्थकेयर में ऑर्थोपेडिक्स और रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट के डायरेक्टर एवं हेड डॉ. आशीष चौधरी, सर्जिकल ऑन्कोलॉजी के डायरेक्टर डॉ. अरुण कुमार गिरी और ऑर्थोपेडिक्स कंसल्टेंट डॉ. अभिषेक कुमार सांभरिया ने किया। डॉ. आशीष चौधरी ने बताया कि जब पहली बार मां की हड्डी से बच्चे की हड्डी बनाने का विचार आया, तब इस तकनीक को पैरों में इस्तेमाल करने के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध थी। उन्होंने कहा कि टीम ने मेडिकल रिसर्च का अध्ययन करने और काफी विचार-विमर्श के बाद यह कदम उठाया। पांच साल बाद पहले मरीज की हड्डी बढ़ रही है और वह सामान्य जीवन जी रही है।

बच्चों के इलाज के लिए एक नई उम्मीद-
डॉ. चौधरी के मुताबिक, मां की हड्डी का ग्राफ्ट उपलब्ध होना और बच्चे के साथ जैविक अनुकूलता इसकी अहम खूबियां हैं। हालांकि, इस तरह की सर्जरी में मां और बच्चे, दोनों की सुरक्षा और रिकवरी पर ध्यान देना जरूरी है। इस तकनीक ने उन बच्चों के इलाज के लिए एक नई उम्मीद दिखाई है, जिनकी हड्डियां कैंसर या गंभीर संक्रमण के कारण खराब हो जाती हैं। हालांकि, हर मरीज के लिए यह तरीका उपयुक्त होगा या नहीं, इसका फैसला उसकी बीमारी और मेडिकल स्थिति के आधार पर डॉक्टर ही करते हैं।