बोन मैरो ट्रांसप्लांट में फोर्टिस गुरुग्राम की बड़ी उपलब्धि, 2,500 मरीजों को मिला नया जीवन
फोर्टिस गुरुग्राम ने 2,500 से अधिक सफल बोन मैरो ट्रांसप्लांट कर बड़ी उपलब्धि हासिल की है. इस उपलब्धि ने ब्लड कैंसर और गंभीर रक्त रोगों से जूझ रहे हजारों मरीजों के लिए नई उम्मीद जगाई है.
गुरुग्राम के फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट (एफएमआरआई) ने बोन मैरो ट्रांसप्लांट (बीएमटी) के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है. अस्पताल ने अब तक 2,500 से ज्यादा सफल बोन मैरो ट्रांसप्लांट किए हैं. यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उन हजारों मरीजों और उनके परिवारों के लिए उम्मीद की नई किरण है, जिन्हें ब्लड कैंसर और गंभीर रक्त संबंधी बीमारियों से लड़ने का मौका मिला.
जीवनरक्षक इलाज बन चुका-
बोन मैरो ट्रांसप्लांट आज उन मरीजों के लिए जीवनरक्षक इलाज बन चुका है, जो ल्यूकेमिया, लिंफोमा, मल्टीपल मायलोमा, थैलेसीमिया, सिकल सेल डिजीज, एप्लास्टिक एनीमिया और कई दुर्लभ रक्त रोगों से जूझ रहे हैं. पहले इसे आखिरी विकल्प माना जाता था, लेकिन अब आधुनिक तकनीकों की मदद से इसकी सफलता दर और मरीजों की रिकवरी दोनों में काफी सुधार हुआ है.
मरीजों की देखभाल विशेषज्ञों की पूरी टीम करती है-
फोर्टिस गुरुग्राम में इलाज के दौरान मरीजों की देखभाल सिर्फ एक डॉक्टर नहीं, बल्कि विशेषज्ञों की पूरी टीम करती है. इसमें हेमेटोलॉजिस्ट, कैंसर विशेषज्ञ, बच्चों के ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ, संक्रमण रोग विशेषज्ञ, आईसीयू डॉक्टर, नर्स, डाइटिशियन और रिहैबिलिटेशन एक्सपर्ट शामिल होते हैं. यही वजह है कि भारत ही नहीं, अफ्रीका समेत कई देशों से मरीज यहां इलाज के लिए पहुंच रहे हैं.
हजारों जिंदगियों को नया जीवन देने की कहानी-
अस्पताल के हेमेटोलॉजी एवं बोन मैरो ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ डॉ. राहुल भार्गव का कहना है कि 2,500 ट्रांसप्लांट का आंकड़ा केवल एक उपलब्धि नहीं, बल्कि 2,500 जिंदगियों को नया जीवन देने की कहानी है. उनके मुताबिक आज जेनेटिक्स, एडवांस डोनर मैचिंग, सेलुलर थेरेपी और नई तकनीकों की मदद से उन बीमारियों का भी इलाज संभव हो रहा है, जिन्हें कभी बेहद कठिन माना जाता था.
बोन मैरो ट्रांसप्लांट अक्सर नई जिंदगी का मौका देता-
बच्चों के इलाज में भी इस तकनीक ने कई परिवारों की जिंदगी बदल दी है। पेडियाट्रिक हेमेटोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. विकास दुआ के अनुसार, ब्लड कैंसर, थैलेसीमिया और इम्यून सिस्टम से जुड़ी बीमारियों से पीड़ित बच्चों के लिए बोन मैरो ट्रांसप्लांट अक्सर नई जिंदगी का मौका देता है. उनका उद्देश्य सिर्फ मरीज की जान बचाना नहीं, बल्कि उसे फिर से सामान्य बचपन और बेहतर भविष्य देना भी है.
तीन साल की त्रिया क्रिस्ले की सफलता की एक भावुक कहानी-
इस सफलता की एक भावुक कहानी तीन साल की त्रिया क्रिस्ले की है. उसे दोबारा लौटे ब्लड कैंसर (एएलएल) के इलाज के लिए भारत लाया गया था. फोर्टिस में सफल स्टेम सेल ट्रांसप्लांट के बाद अब वह तेजी से स्वस्थ हो रही है. उसके परिवार का कहना है कि अस्पताल की टीम ने इलाज के दौरान सिर्फ डॉक्टर की नहीं, बल्कि परिवार की तरह साथ निभाया.
युगांडा की मुलेम एलिशा इसइआह ट्रांसप्लांट के बाद सामान्य जीवन-
एक और प्रेरणादायक उदाहरण युगांडा की मुलेम एलिशा इसइआह हैं. उनका बोन मैरो ट्रांसप्लांट 2018 में फोर्टिस गुरुग्राम में हुआ था. आज वह पूरी तरह स्वस्थ हैं, स्कूल जाती हैं, फुटबॉल खेलती हैं और सामान्य बच्चों की तरह जिंदगी का आनंद ले रही हैं. उनका सफर बताता है कि सही समय पर इलाज मिलने से मरीज पूरी तरह सामान्य जीवन जी सकते हैं.
मरीजों का विश्वस्तरीय और जीवनरक्षक इलाज-
फोर्टिस का कहना है कि आने वाले समय में वह बोन मैरो ट्रांसप्लांट, सेलुलर थेरेपी, जीनोमिक्स और प्रिसीजन मेडिसिन जैसी आधुनिक तकनीकों को और मजबूत करेगा, ताकि भारत और विदेशों से आने वाले ज्यादा से ज्यादा मरीजों को विश्वस्तरीय और जीवनरक्षक इलाज मिल सके.