कला के जरिए संवाद और परिवर्तन का उत्सव: रेनेसां फेस्टिवल 2026
रेनेसां फेस्टिवल 2026 में शास्त्रीय और समकालीन प्रस्तुतियों के संगम ने कला को विचार, भावना और सामाजिक अभिव्यक्ति के प्रभावशाली मंच के रूप में प्रस्तुत किया.
लाइट सेंस आर्ट फाउंडेशन द्वारा मिलिंद श्रीवास्तव के कलात्मक निर्देशन में आयोजित दो दिवसीय रेनेसां फेस्टिवल 2026 का समापन प्रभावशाली अंदाज़ में हुआ. इस आयोजन ने भारतीय प्रदर्शन कलाओं को परंपरा और समकालीन विचार के गतिशील मंच के रूप में स्थापित करने की अपनी परिकल्पना को साकार किया.
शास्त्रीय और समकालीन नृत्य प्रस्तुतियों का सशक्त संयोजन-
राजधानी में आयोजित इस फेस्टिवल में शास्त्रीय और समकालीन नृत्य प्रस्तुतियों का सशक्त संयोजन देखने को मिला, जिसने दर्शकों को विरासत, नवाचार और विकसित होती कलात्मक अभिव्यक्ति के बीच संवाद से जोड़ा.
पहला दिन: परंपरा का आह्वान और दार्शनिक गहराई
फेस्टिवल का उद्घाटन दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ, जिसमें अशोक कुमार तिवारी (संस्कार भारती), शोवना नारायण, रंजना गौहर और गीतांजलि लाल सहित अनेक प्रतिष्ठित हस्तियां उपस्थित रहीं. यह रस्म परंपरा को जीवंत और निरंतर विकसित होती प्रक्रिया के रूप में दर्शाती रही.
शाम का प्रमुख आकर्षण लाइट डिजाइनर अवॉर्ड का मुरुगन कृष्णन को प्रदान किया जाना रहा, जिन्होंने पिछले दो दशकों में अंतरराष्ट्रीय मंचों और भारतीय शास्त्रीय नृत्य प्रस्तुतियों के लिए मंच प्रकाश व्यवस्था में उल्लेखनीय योगदान दिया है.
सृजन और विनाश की प्रक्रिया पर आधारित एक ध्यानपूर्ण प्रस्तुति-
मुख्य प्रस्तुति “संहृति”, जिसका कोरियोग्राफी नारायण शर्मा ने किया, सृजन और विनाश की प्रक्रिया पर आधारित एक ध्यानपूर्ण प्रस्तुति रही. नृत्य, ध्वनि और दृश्य संरचना के संयोजन ने अस्तित्व के चक्रीय स्वरूप को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया.
शास्त्रीय और समकालीन दृष्टि का सुंदर समन्वय प्रस्तुत-
अन्य प्रस्तुतियों में “माया: द लास्ट इमिटेशन” (कलामंडलम विष्णुप्रिया मारार और उन्नी विश्वनाथ मारार) ने शास्त्रीय और समकालीन दृष्टि का सुंदर समन्वय प्रस्तुत किया. वहीं विक्की भार्तिया की प्रस्तुति “शिवा” ने छऊ और आधुनिक नृत्य के माध्यम से ऊर्जा और स्थिरता के द्वैत को दर्शाया.
भ्रम और वास्तविकता के बीच की सूक्ष्म रेखा को रेखांकित-
संगीता चटर्जी की प्रस्तुति “मिराज” ने भ्रम और वास्तविकता के बीच की सूक्ष्म रेखा को रेखांकित करते हुए पहचान, अनुभूति और आंतरिक जगत के विषयों को सामने रखा.
प्रकाश को ज्ञान और अज्ञान के निवारण के प्रतीक के रूप में-
कार्यक्रम में “दीपम ज्योति परब्रह्म” की आध्यात्मिक प्रस्तुति ने प्रकाश को ज्ञान और अज्ञान के निवारण के प्रतीक के रूप में स्थापित किया. इस प्रस्तुति में संगीत संयोजन श्री सरोज मोहंती, ताल संरचना श्री प्रदीप्त कुमार महाराणा और नृत्य संयोजन गुरु सुदर्शन साहू द्वारा किया गया.

दूसरा दिन: स्मृति, प्रतिरोध और मुक्ति की अभिव्यक्ति-
फेस्टिवल के दूसरे दिन ने प्रदर्शन कला को स्मृति, प्रतिरोध और सामाजिक चिंतन के माध्यम के रूप में सामने रखा इस अवसर पर कथक नृत्यांगना और एसएनए युवा पुरस्कार से सम्मानित गौरी दिवाकर की प्रस्तुति ने शाम को शास्त्रीय गरिमा प्रदान की.
दासता के इतिहास पर आधारित एक मार्मिक प्रस्तुति-
“चेन्स – द अनटोल्ड पेन” प्रस्तुति, जिसका अवधारणा और कोरियोग्राफी नंदा कुमार द्वारा किया गया, दासता के इतिहास पर आधारित एक मार्मिक प्रस्तुति रही. इस प्रस्तुति ने पीड़ा और संघर्ष को सशक्त नृत्य भाषा में रूपांतरित किया.
हर भाव में इतिहास की गूंज-
कोरियोग्राफी के माध्यम से कलाकारों ने बंधन से स्वतंत्रता की यात्रा को प्रस्तुत किया. बिना संवाद के, नर्तकों ने शारीरिक ऊर्जा, लय और गति के माध्यम से संघर्ष, धैर्य और प्रतिरोध की कथा कही. मंच कभी जहाज़ का ढांचा बना, तो कभी बागानों का दृश्य हर भाव में इतिहास की गूंज दिखाई दी.
संघर्ष की विरासत शक्ति में बदलती-
“चेन्स” की विशेषता यह रही कि यह केवल पीड़ा तक सीमित नहीं रही, बल्कि सशक्तिकरण की दिशा में आगे बढ़ी. प्रस्तुति ने दिखाया कि सामूहिक स्मृति और लय के माध्यम से संघर्ष की विरासत शक्ति में बदलती है. अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ती दृश्य संरचना परिवर्तन और मुक्ति का प्रतीक बनी.
ऊर्जा और सामंजस्य के साथ प्रस्तुति को जीवंत किया-
विभिन्न कलाकारों से सजे समूह ने ऊर्जा और सामंजस्य के साथ प्रस्तुति को जीवंत किया. उनकी गतियों ने पीड़ा को कला, मौन को आवाज़ और इतिहास को समकालीन अभिव्यक्ति में बदल दिया.
चिंतन और प्रासंगिकता का उत्सव-
दोनों दिनों में रेनेसां फेस्टिवल 2026 ने प्रदर्शन को केवल मनोरंजन तक सीमित न रखते हुए उसे चिंतन, दार्शनिक संवाद और कलात्मक विमर्श का मंच बनाया. शास्त्रीय आधार और समकालीन कथाओं को साथ बुनते हुए फेस्टिवल ने यह स्थापित किया कि भारतीय प्रदर्शन कलाएं आज भी समयातीत और समकालीन मानवीय अनुभवों को व्यक्त करने में सक्षम हैं.
कला आज भी परिवर्तन लाने का सशक्त माध्यम-
दर्शकों की सराहना के बीच फेस्टिवल का समापन हुआ, जो यह संदेश देकर गया कि कला आज भी याद करने, प्रश्न करने और परिवर्तन लाने का सशक्त माध्यम है.