अब भूलने की समस्या को सिर्फ उम्र का असर नहीं माना जाएगा, गुरुग्राम में शुरू हुआ मेमोरी एंड ब्रेन हेल्थ क्लिनिक
गुरुग्राम के मैरेंगो एशिया हॉस्पिटल्स में मेमोरी एंड ब्रेन हेल्थ क्लिनिक शुरू किया गया है। यहां भूलने की समस्या, अल्जाइमर, डिमेंशिया और सोचने-समझने की क्षमता में बदलाव से जुड़ी परेशानियों की जांच और मार्गदर्शन किया जाएगा।
उम्र बढ़ने के साथ कभी-कभार चीजें भूल जाना आम बात है। लेकिन अगर भूलने की समस्या रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगे, तो इसे सिर्फ उम्र का असर मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। अब डॉक्टर यह समझने पर भी ध्यान दे रहे हैं कि याददाश्त में बदलाव की वजह क्या है और समय रहते इसकी जांच कैसे की जाए।
विश्व अल्जाइमर दिवस-
इसी दिशा में विश्व अल्जाइमर दिवस के मौके पर गुरुग्राम के मैरेंगो एशिया हॉस्पिटल्स ने फेडरेशन ऑफ सीनियर सिटिजन्स वेलफेयर फोरम के साथ मिलकर ‘हेल्थ टॉक’ और ‘ब्रेन जिम सेशन’ आयोजित किया। इसका मकसद वरिष्ठ नागरिकों को दिमाग की सेहत के प्रति जागरूक करना और स्वस्थ तरीके से उम्र बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना था।

शुरू हुआ मेमोरी एंड ब्रेन हेल्थ क्लिनिक-
कार्यक्रम के दौरान मैरेंगो एशिया इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरो एंड स्पाइन (MAIINS) के तहत ‘मेमोरी एंड ब्रेन हेल्थ क्लिनिक’ की शुरुआत भी की गई। इस क्लिनिक में उन लोगों की जांच और मार्गदर्शन किया जाएगा जिन्हें बार-बार भूलने, याददाश्त में कमी, अल्जाइमर, डिमेंशिया या सोचने-समझने की क्षमता में बदलाव जैसी समस्याएं हैं।
कॉग्निटिव इम्पेयरमेंट क्या है?
कॉग्निटिव इम्पेयरमेंट यानी सोचने-समझने, याद रखने, ध्यान लगाने या सही फैसले लेने की क्षमता में कमी। यह समस्या हर व्यक्ति में अलग तरह से दिखाई दे सकती है। मेमोरी से जुड़ी परेशानी का कारण हमेशा अल्जाइमर नहीं होता। पार्किंसंस रोग, कुछ न्यूरोलॉजिकल बीमारियां (दिमाग और नसों से जुड़ी बीमारियां), मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं, नींद, दवाएं और जीवनशैली भी याददाश्त पर असर डाल सकती हैं।
कैसे होगी जांच?
क्लिनिक में सबसे पहले मरीज से उसकी परेशानी और रोजमर्रा की जिंदगी के बारे में बातचीत की जाएगी। इसके बाद छोटी मेमोरी स्क्रीनिंग यानी याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता की शुरुआती जांच की जा सकती है। अगर जरूरत महसूस हुई तो न्यूरोसाइकोलॉजिकल असेसमेंट यानी याददाश्त, ध्यान और दूसरी मानसिक क्षमताओं की विस्तृत जांच की जाएगी। न्यूरोलॉजिकल जांच यानी दिमाग और नसों से जुड़ी जांच भी की जा सकती है। जरूरत पड़ने पर मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी जांच भी होगी। इन जांचों से डॉक्टरों को यह समझने में मदद मिलेगी कि समस्या की संभावित वजह क्या है और मरीज के लिए आगे किस तरह की देखभाल की जरूरत है।

किन लोगों को जांच पर ध्यान देना चाहिए?
अगर कोई व्यक्ति बार-बार रोजमर्रा के काम, तारीखें या अपॉइंटमेंट भूल रहा है, चीजें रखकर भूल जाता है, नाम याद रखने में परेशानी होती है या बातचीत समझने में दिक्कत आने लगी है, तो डॉक्टर से सलाह लेना ठीक रहेगा। अगर परिवार के लोगों को भी किसी व्यक्ति के व्यवहार या याददाश्त में ऐसा बदलाव नजर आता है, जिसका असर उसकी रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ रहा है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
मेमोरी केयर सिर्फ अल्जाइमर तक सीमित नहीं-
मेमोरी केयर का मतलब सिर्फ अल्जाइमर या डिमेंशिया का इलाज नहीं है। डिमेंशिया यानी ऐसी स्थिति जिसमें याददाश्त, सोचने-समझने और रोजमर्रा के काम करने की क्षमता प्रभावित होने लगती है। इसके अलावा पार्किंसंस और दिमाग व नसों से जुड़ी दूसरी बीमारियां भी कॉग्निटिव यानी सोचने-समझने की क्षमता पर असर डाल सकती हैं।

नई जांच और इलाज पर भी जोर-
मेमोरी केयर में अब ब्लड-बेस्ड बायोमार्कर यानी खून में बीमारी से जुड़े संकेतों की जांच जैसी तकनीकों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। इनमें p-tau217 जैसे मार्कर शामिल हैं, जो कुछ मरीजों में अल्जाइमर की पहचान में डॉक्टरों की मदद कर सकते हैं।हालांकि, सिर्फ ब्लड टेस्ट से यह पक्के तौर पर नहीं बताया जा सकता कि किसी स्वस्थ व्यक्ति को भविष्य में अल्जाइमर होगा या नहीं। डॉक्टर की जांच और जरूरत के मुताबिक दूसरी जांचें भी जरूरी होती हैं।
शुरुआती अल्जाइमर के कुछ मरीजों के लिए नई दवाएं-
शुरुआती अल्जाइमर के कुछ मरीजों के लिए lecanemab और donanemab जैसी नई दवाएं भी उपलब्ध हैं। इन्हें disease-modifying therapies यानी ऐसे इलाज जो बीमारी की बढ़त को धीमा करने में मदद करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं कहा जाता है।
भारत में भी बढ़ रही है जागरूकता की जरूरत-
भारत में बुजुर्गों में याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता से जुड़ी समस्याओं पर ध्यान बढ़ रहा है। एक स्टडी में बुजुर्गों के बीच हल्के और गंभीर कॉग्निटिव बदलाव के मामले सामने आए हैं। इसी स्टडी में हरियाणा और दिल्ली में डिमेंशिया के मामलों का भी अनुमान लगाया गया था। हालांकि, ये आंकड़े पूरे राज्य से जुड़े हैं और इन्हें सीधे गुरुग्राम शहर के आंकड़े के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

याददाश्त में होने वाले बदलावों को नजरअंदाज न करें-
मैरेंगो एशिया हॉस्पिटल्स के विशेषज्ञों का कहना है कि परिवारों को याददाश्त में होने वाले बदलावों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर जांच होने से समस्या की वजह समझने और जरूरत के मुताबिक आगे की देखभाल की योजना बनाने में मदद मिल सकती है।