2030 तक ₹84 हजार करोड़ का हो सकता है भारत का सीनियर लिविंग मार्केट, ASLI-JLL रिपोर्ट का बड़ा अनुमान

10.1 बिलियन डॉलर! 2030 तक भारत का सीनियर लिविंग मार्केट इस स्तर तक पहुंच सकता है। ASLI-JLL रिपोर्ट के मुताबिक, बढ़ती बुजुर्ग आबादी के साथ इस सेक्टर में बड़ा निवेश और विकास संभावित है।

2030 तक ₹84 हजार करोड़ का हो सकता है भारत का सीनियर लिविंग मार्केट, ASLI-JLL रिपोर्ट का बड़ा अनुमान

भारत में बुजुर्गों की बढ़ती आबादी के साथ अब सीनियर लिविंग और उनकी देखभाल से जुड़े कारोबार की जरूरत भी तेजी से बढ़ रही है। ASLI-JLL की नई रिपोर्ट “India’s Silver Economy: From Niche to Necessity” के मुताबिक, भारत का सीनियर लिविंग मार्केट 2030 तक करीब 10.1 बिलियन अमेरिकी डॉलर यानी लगभग ₹84 हजार करोड़ तक पहुंच सकता है।

यह अवसर सिर्फ वरिष्ठ नागरिकों के लिए घर बनाने तक सीमित नहीं-

रिपोर्ट के मुताबिक, इस बढ़ते बाजार की जरूरत पूरी करने के लिए करीब 7.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर के पूंजी निवेश की जरूरत पड़ सकती है। खास बात यह है कि यह अवसर सिर्फ वरिष्ठ नागरिकों के लिए घर बनाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें हेल्थकेयर, असिस्टेड लिविंग, रिहेबिलिटेशन, विशेष देखभाल और दूसरी जरूरी सेवाएं भी शामिल होंगी।

अभी सिर्फ 1.5% वरिष्ठ नागरिकों तक पहुंच-

भारत में जून 2026 तक संगठित सीनियर लिविंग के करीब 25,050 यूनिट्स मौजूद हैं। इसके बावजूद इस सेक्टर की पहुंच सिर्फ 1.5% है। तुलना करें तो अमेरिका में यह आंकड़ा करीब 6-7% और न्यूजीलैंड में 14-15% है। यानी भारत में इस क्षेत्र के विस्तार की काफी बड़ी गुंजाइश है। रिपोर्ट के अनुसार, 2019-2023 के दौरान सेक्टर की ग्रोथ करीब 8.5% CAGR थी, जो 2024 से जून 2026 के बीच बढ़कर 14.2% CAGR हो गई।

166.9 मिलियन बुजुर्ग, 2050 तक संख्या दोगुनी होने का अनुमान-

भारत में 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों की संख्या फिलहाल करीब 166.9 मिलियन है। अनुमान है कि 2050 तक यह संख्या बढ़कर करीब 346 मिलियन हो सकती है। वहीं, शहरी और आर्थिक रूप से स्वतंत्र वरिष्ठ नागरिकों वाले परिवारों का बाजार 2026 में करीब 1.7 मिलियन है, जो 2030 तक बढ़कर 2.1 मिलियन होने का अनुमान है। इसका सीधा मतलब है कि आने वाले वर्षों में ऐसे घरों, कम्युनिटीज और सेवाओं की मांग बढ़ सकती है, जहां बुजुर्गों को रहने के साथ-साथ स्वास्थ्य और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी सुविधाएं मिल सकें।

असिस्टेड लिविंग में सबसे बड़ा गैप-

सीनियर लिविंग सेक्टर में असिस्टेड लिविंग सबसे बड़ी जरूरतों में से एक बनकर सामने आ रहा है। फिलहाल देश में करीब 2,100 असिस्टेड लिविंग बेड्स उपलब्ध हैं, जबकि 2030 तक इसकी जरूरत करीब 11,000 बेड्स तक पहुंचने का अनुमान है। 75 साल से ज्यादा उम्र की आबादी भी करीब 7.8% की सालाना दर से बढ़ रही है। ऐसे में ज्यादा देखभाल और मेडिकल सपोर्ट की जरूरत वाले वरिष्ठ नागरिकों की संख्या बढ़ना तय माना जा रहा है।

अच्छी सुविधाओं में 80-85% तक पहुंची ऑक्युपेंसी-

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि अच्छी तरह संचालित सीनियर लिविंग सुविधाओं में 80-85% तक ऑक्युपेंसी देखी जा रही है। इससे संकेत मिलता है कि भरोसेमंद और अच्छी क्वालिटी वाली वरिष्ठ नागरिक सेवाओं की मांग पहले से मौजूद है। हालांकि, इस सेक्टर के सामने प्रशिक्षित केयरगिवर्स की कमी और जमीन व रियल एस्टेट की ऊंची लागत जैसी चुनौतियां भी हैं।

2030 के लिए तीन संभावित तस्वीरें-

ASLI-JLL रिपोर्ट ने 2030 के लिए तीन अलग-अलग विकास परिदृश्य बताए हैं—

बेसलाइन: करीब 51,000 यूनिट्स और 4.5 बिलियन डॉलर का बाजार

तेज विकास: करीब 63,000 यूनिट्स और 6.2 बिलियन डॉलर का बाजार

नीति-संचालित विकास: करीब 74,000 यूनिट्स और 7.7 बिलियन डॉलर का बाजार

रिपोर्ट के मुताबिक, अगर सही नीतिगत सहयोग मिलता है तो सेक्टर में नई सप्लाई और निवेश को तेजी मिल सकती है।

महाराष्ट्र और हरियाणा से मिल सकता है रास्ता-

रिपोर्ट में महाराष्ट्र और हरियाणा को सीनियर लिविंग के लिए उभरते हुए नीतिगत मॉडल के तौर पर बताया गया है। महाराष्ट्र में सीनियर हाउसिंग को योजनागत मानकों और हेल्थकेयर से जुड़ी सुविधाओं के जरिए औपचारिक पहचान दी गई है। वहीं हरियाणा में अनुमति प्रक्रिया को आसान बनाने और FAR जैसे प्रोत्साहनों के जरिए परियोजनाओं की व्यवहार्यता बढ़ाने पर जोर दिया गया है।

सिर्फ घर नहीं, अब ‘केयर’ भी जरूरी-

सीनियर लिविंग का मॉडल अब सिर्फ घर उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रह रहा है। आने वाले वर्षों में रेंटल और सर्विस-बेस्ड मॉडल ज्यादा लोकप्रिय हो सकते हैं। इसके साथ ही मेमोरी केयर, रिहेबिलिटेशन और ऐसे कम्युनिटीज की मांग बढ़ सकती है, जहां जरूरत पड़ने पर रहने की सुविधा से लेकर स्वास्थ्य सेवाएं तक एक ही जगह उपलब्ध हों।

टेक्नोलॉजी भी बन रहीं है बदलाव का हिस्सा-

टेक्नोलॉजी भी इस बदलाव का हिस्सा बन रही है। कई ऑपरेटर इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड, हेल्थ मॉनिटरिंग डिवाइस और टेलीमेडिसिन जैसी सुविधाओं पर निवेश कर रहे हैं।

अफोर्डेबिलिटी अभी भी बड़ी चुनौती-

बढ़ती मांग के बावजूद हर वरिष्ठ नागरिक के लिए सीनियर लिविंग की लागत वहन करना आसान नहीं है। खासकर उन लोगों के लिए जिनके पास अपना घर तो है, लेकिन नियमित आय सीमित है। ऐसे में रिवर्स मॉर्टगेज, इंश्योरेंस से जुड़े नए उत्पाद और दूसरे वित्तीय विकल्प अहम भूमिका निभा सकते हैं। इनसे बुजुर्ग अपनी मौजूदा संपत्ति का इस्तेमाल बेहतर देखभाल के लिए फंड जुटाने में कर सकते हैं।

आगे क्या करना होगा?

रिपोर्ट में सेक्टर को तेजी देने के लिए कई कदम सुझाए गए हैं। इनमें सीनियर केयर सेवाओं पर GST को आसान बनाना, रिवर्स मॉर्टगेज को बढ़ावा देना, इंश्योरेंस कंपनियों को सीनियर लिविंग से जोड़ना, अस्पतालों के साथ साझेदारी और पूरे देश के लिए एक स्पष्ट राष्ट्रीय नीति तैयार करना शामिल है।

सेक्टर की सबसे बड़ी जरूरत-

कुल मिलाकर, भारत की बढ़ती बुजुर्ग आबादी सीनियर लिविंग को एक छोटे से रियल एस्टेट सेगमेंट से निकालकर बड़े ‘सिल्वर इकॉनमी’ में बदल सकती है। आने वाले समय में अच्छी हाउसिंग के साथ हेल्थकेयर, केयरगिविंग, टेक्नोलॉजी और वित्तीय सेवाओं का मजबूत नेटवर्क बनाना इस सेक्टर की सबसे बड़ी जरूरत होगी।